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राजस्थान में ब्रिटिश शासन का विस्तार (Rajasthan Me British Sasan Ka Vistar) || Expansion of British rule in Rajasthan || GK For Competition Exams || Rajasthan GK Important Questions




राजस्थान में ब्रिटिश शासन का विस्तार


भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का प्रभाव राजस्थान की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक स्थिति पर भी पड़ा। वर्ष 1749 से पूर्व राजस्थान में कुल 19 रियासतें थी तथा कुशलगढ़, नीमराणा और कावा की चीफशिप की प्रशासनिक इकाइयाँ भी थीं। इनमें से उदयपुर, गूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और शाहपुरा में गुहिल राजपूत जोधपुर, बीकानेर और किशनगढ़ में राठौड़ राजपूत कोटा और उदी में देवड़ा चौहान, जयपुर और अलवर में कछवाहा राजपूत जैसलमेर और करौली में यदुवंशी राजपूत झालावाड़ में झाला राजपूत भरतपुर और धौलपुर में जाट राजाओं के राज्य थे। टोंक में मुसलमान नवाब का राज्य था। इन सबके मध्य में अजमेर मारवाड़ प्रदेश था। यह सम्पूर्ण क्षेत्र भक्तिशौर्य और बलिदान की गाथाओं के कारण विख्यात था। मेवाड़ के राणा कुम्भासाँगा और महाराणा प्रताप मारवाड़ के राजा मालदेव, भरतपुर का जाट राजा सूरजमलदी के हाड़ा राजा हम्मीर आदि ने समयसमय पर अपने स्वाभिमान और शौर्य का प्रदर्शन किया और स्वतन्त्रता की रक्षा की थी।

बाद में राजपूताना की रियासतों के राजा अपनी अदूरदर्शिता पूर्ण नीतियों और संगठन शक्ति के अभाव के कारण पहले मुगल बादशाहों और बाद में अंग्रेजों के अधीन हो गए। देशी राज्यों को अंग्रेजों की राजनीतिक परिधि में लाने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड वैलेजली (1798-1805) द्वारा सहायक सन्धि की नीति प्रारम्भ की गई। जिसके तहत देशी राज्यों की आन्तरिक सुरक्षा व विदेशी नीति का उत्तरदायित्व अंग्रेजों पर था एवं जिसका खर्च सम्बन्धित राज्य को उठाना पड़ता था। कम्पनी इस हेतु उस राज्य में एक

अंग्रेज रेजीडेन्ट की नियुक्ति करती थी व सुरक्षा हेतु अपनी सेना रखती थी। राजस्थान में सर्वप्रथम भरतपुर राज्य के महाराणा रणजीत सिंह ने 29 सितम्बर1808 को लॉर्ड वैलेजली से सहायक सन्धि की परन्तु विस्तृत रक्षात्मक एवं आक्रमण सन्धि सर्वप्रथम अलवर रियासत ने 14 नवम्बर1808 को की थी। भारत में प्रथम सहायक सन्धि 1798 ई. में हैदराबाद के निजाम के साथ की गई थी। बाद में मराठोंपिण्डारियों की लूट-खसोट से तंग आकर राजस्थान के राजाओं ने लॉर्ड हार्डिंग्स की 'आश्रित पार्थक्य की नीति के तहत भी अंग्रेजों से सन्धियाँ की। सर्वप्रथम करौली के राजा ने नवम्बर, 1817 में अंग्रेजों के साथ यह सन्धि की । परन्तु विस्तृत एवं व्यापक प्रभावशाली सन्धि 26 दिसम्बर1817 को कोटा के प्रशासक झाला जालिम सिंह ने कोटा राज्य की ओर से की।

वर्ष 1818 के अन्त तक सभी रियासतों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ आश्रित पार्थस्य की सन्थियों पर हस्ताक्षर कर दिए और अंग्रेजों को खिराज देना स्वीकार किया। केवल सिरोही राज्य ने कम्पनी से सन्धि 1823 ई. में की। इसकी एवज में कम्पनी ने रियासतों की रक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली व रेजीडेन्ट व पॉलिटिकल एजेण्ट नियुक्त किए। उस समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स थे। धीरे-धीरे अंग्रेजों ने रियासतों के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप शुरू कर दिया व अपने हितों के लिए इन राज्यों का आर्थिक शोषण भी शुरू कर दिया। इस प्रकार ब्रिटिश शासन ने राजस्थान की रियासतों पर भी अपना दमन चक्र चलाकर जनता का अधिकाधिक शोषण करना शुरू कर दिया। चार्ल्स मेटकॉफ व कर्नल टॉड ने 181718 ई. की सन्धियों को सम्पादित किया था।

लॉर्ड डलहौजी ने 1848 . में अंग्रेजी राज्य के विस्तार व स्थायित्व की दृष्टि से एक नये सिद्धान्त राज्यों के विलय की नीति का सूत्रपात कियाजिसमें यह व्यवस्था थी कि यदि कोई राजा या नवाब बिना सन्तान मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तो रियासत पर उसका परम्परागत अधिकार समाप्त माना जाएगा और जब्त कर उसे अंग्रेजों के अधिकार में ले लिया जाएगा। इस सिद्धान्त की शिकार झांसी, नागपुरअवधकर्नाटक, सतारा आदि रियासतें हुई। इसके तहत सर्वप्रथम 1848 ईमें सतारा को और अन्त में 1856 ई. में अवध को अंग्रेजी राज्य में मिलाया गया। इससे अंग्रेजों के प्रति असन्तोष बढ़ने लगा। इसके अलावा सेना में एनफील्ड राइफलों में चबी लगे कारतूसों के प्रयोग ने सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को बुरी तरह

आहत किया। इससे 29 मार्च1857 को 34वीं रेजीमेन्ट के मंगल पाण्डे ने बैरकपुर छावनी में अंग्रेज सैनिकों को गोली मार दी। 1767 ई. के प्लासी के युद्ध से लेकर 1857 तक के 100 वर्ष के समय में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की शोषणकारीजातीय भेदभाव पूर्ण एवं राजनीतिक दखलन्दाजी पूर्ण नीतियों ने भारतीय जनमानसशासकों व जमींदारों को असन्तुष्ट कर दिया। फलतः देशी राजा व सेना अंग्रेजों के विरुद्ध हो गई और अंग्रेजी सत्ता को भारत से उखाड़ फेंकने की दिशा में पहला प्रयत्न स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम के रूप में सामने आया। देशी राजाओं ने अन्तिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में यह जंग लड़ने का फैसला किया। 10 मई1857 को मेरठ की छावनी में सेना ने विद्रोह कर दिया। अंग्रेजों से देश को स्वतन्त्र कराने की दिशा में यह पहला बड़ा प्रयत्न था। इसी कारण इस क्रान्ति को 'भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्रामकहा जाता है। इस विद्रोह से राजस्थान भी अलग नहीं रह सका। 1857 ई के स्वतन्त्रता संग्राम के समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग व राजस्थान के ए. जी. जी. जॉर्ज पेट्रिक्स लॉरेन्स थे और राजस्थान में अंग्रेजी सरकार की व्यावरनसीराबाद, नीमचएरिनपुरादेवली व खैरवाड़ा (उदयपुर) में 6 सैनिक छावनियाँ थीं जिनमें सभी सैनिक भारतीय थे। इस समय मेवाड़ में मेजर शावर्समारवाड़ में मेजर मैकमैसनकोटा में मेजर बर्टन तथा जयपुर में कर्नल ईडन प्रमुख सरकारी एजेण्ट थे।
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